कश्मीर पर नई दिल्ली का हमला और सांप्रदायिक प्रतिक्रिया, साम्राज्यवाद और युद्ध के खिलाफ लड़ाई

१० अगस्त २०१९

पिछले सोमवार(5 अगस्त) परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों भारत व पाकिस्तान के बीच 70 साल पुरानी सैन्य-रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता का केंद्र रहे तथा भारत द्वारा नियंत्रित कश्मीर क्षेत्र के भूभाग से भारतीय हिंदूवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर (J& K)की‘अर्द्ध’-स्वायत्तस्थिति को अवैध रूप से समाप्त कर दिया गया।

भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों मेंबांटकर जम्मू-कश्मीरकेइकलौते मुस्लिम बहुल राज्यकी स्थिति को भी समाप्त कर दिया। नई वयवस्था में अब जम्मू-कश्मीर में “चुनी गई” विधानसभा होगी और ये केंद्र सरकार की ट्रस्टीशिप के अधीन होकर केवल एक दिखावटी विधानसभा होगी।

कश्मीर केविवादित क्षेत्र का नक्शा [स्रोत: विकिमीडिया कॉमन्स]

ये बदलावप्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियोंद्वारा एक तख्तापलट के माध्यम से लागू किये गए हैं।

जम्मू-कश्मीर व भारत के लोगों को सरकार द्वाराअचानक किये गए इस बदलाव पर बात करने का न तो कोई मौका दिया गया और न ही इस बारे में जानकारी दी गई। उन्हें ये ख़बरसोमवार सुबह मिली कि सरकार ने J&Kके भारत द्वारा नियंत्रणवाले कश्मीर से घेराबंदी की स्थिति खत्म करने के लिए संविधान के विशेष दर्जे से हटा दिया है।

जम्मू-कश्मीर मेंसप्ताहांत तक इंटरनेट, केबल टीवी,सेलफोन और लैंडलाइन फोन सभी सेवाएँ निलंबित कर दी गई हैं। हज़ारों सैनिकों व अर्धसैनिक बलों की क्षेत्र में कर्फ़्यू पर नज़र रहेगी तथा साथ ही चार लोगों से अधिक के एकत्र होने पर पाबंदी जारी रहेगी। जहां एक ओर जेएंडकेको भारतीय संघ में मिलाए जाने की बात सामने आ रही है वहीं दूसरी ओर चेन्नई के “हिन्दू” अखबार ने लिखा हैकि “क्षेत्र देश के बाकी हिस्सों से पूरी तरह से कट गयाहै।“

जम्मू और कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानीश्रीनगरमें तैनात सुरक्षा बल

भाजपा के संवैधानिक तख्तापलट के कई उद्देश्य हैं।इसमें है:

सबसे आखिरी उद्देश्य सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है।भाजपा अच्छी तरह जानती है कि हालांकि उसने चुनाव जीता है पर वो एक विस्फोटक समाज के बीच है। श्रमिक वर्ग का परस्पर बढ़ता विरोध सीधे तौर पर बड़े व्यवसायोंको निवेश समर्थनव सामाजिक सुधारों के लिए मजबूर करेगा।

संसद में एक अस्थिर विपक्ष के साथ भारत के सत्ताधारी पक्षनेइस संवैधानिक तख्तापलट के पीछे बेहद जोखिम उठायाहै।

ये आज दुनिया भर में प्रचलित है। आज दुनिया का संकट से जूझता हुआहर देश,भयभीत सत्ताधारी पक्ष राजनीतिक और भूभाग समस्याओं से निपटने के लिए सैन्य संघर्ष और तमाम असंवैधानिक उपायों को अपना रहे हैं।

देश पाकिस्तान के इस्लामिक क्षिणपंथी प्रधानमंत्री इमरान खानने मंगलवार (6 अगस्त) को "खून की आखिरी बूंद बह जाने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल सहित युद्ध होगा" कहकर बात एकदम साफ़ कर दी है। अगर ये युद्ध हुआ तो ये निश्चित तौर पर एक वैश्विक संघर्ष में बादल जाएगा।

भारत और पाकिस्तान के समस्त श्रमिक वर्ग कोपूंजीवादी कुलीन वर्ग के सभी गुटोंतथाएक समाजवादी अंतर्राष्ट्रीयतावादी कार्यक्रम के आधार परकश्मीर व कश्मीर से आगे समूचे दक्षिण एशिया के इस संकट भरे समय की साज़िशों में खुलकर हस्तक्षेप करना होगा।

विभाजन वअसफल बुर्जुआ शासन

दक्षिण एशिया में इन दिनों पनप रहेसांप्रदायिक तनावव युद्ध के ख़तरे को दो आपसीसंदर्भों के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है।

पहला,जातिवाद व जमींदारीवादसे छुटकारापाने के अलावा साम्राज्यवाद से वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करने या अन्य ज्वलंत लोकतांत्रिक मुद्दों के लिए पूंजीवादीनेतृत्व वालाभारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की असफलता है। ये विफलता हमें 1947 की आज़ादी के दौरान हिन्दू बहुल भारत व मुस्लिम बहुल पाकिस्तान के बीचहुए खूनी संघर्ष में साफ़ दिखाई देती है।

इन दोनों देशोंकी येआपसीप्रतिद्वंद्वितासाम्राज्यवादीवर्चस्व, असफ़लआर्थिक विकास के साथ युद्ध अथवा युद्ध की तैयारियों में अनगिनत संसाधनों के नष्ट होने व कई जिंदगियों की मौत का कारण बनी है। इन दोनों देशों की ये प्रतिद्वंदिता आज समस्त दक्षिण एशिया व पूरी दुनिया के सामने एक संभावित परमाणु ख़तरे के रूप में मंडरा रही है।

दूसरा, वैश्विक पूंजीवाद का सिलसिलेवार संकट है।इसके तहतहर समुदाय केराष्ट्रभक्तबुर्जुआ को अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ मिलकर आक्रामकता और युद्ध के माध्यम सेअपनी स्थिति और विश्व स्तर पर मज़दूर वर्ग के शोषण कोऔर बढ़ाना चाहता है।

1919से 1947-48के तीन दशकों के बीचदक्षिण एशिया में बेहद मज़बूत साम्राज्यवाद विरोधी जन आंदोलन हुआ। लेकिन राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका और ये समाप्त हो गया।

राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की चहेतीतथा महात्मा गांधी व जवाहरलाल नेहरू की कॉंग्रेस पार्टीहिंदू-मुस्लिम एकता के साथखड़े होनेका दावा करती थी। लेकिन अपनी बेशुमार संपत्ति और खराब नीतियों के चलते कॉंग्रेस उन श्रमिकों को एकजुट नहीं करना चाहती थी जिनकी वर्ग संघर्ष के तौर पर एक जैसी नीतियाँ थीं।

1930से लेकर, खासतौर से1942-47के बीचश्रमिक वर्ग की इस बढ़ती ताकत,स्वतंत्र हस्तक्षेप व क्रांतिकारी हस्तक्षेप ने ब्रिटिश भारतमें उथल पुथल कर कॉंग्रेस को डरा दिया।इस दौरान कॉंग्रेस नेतृत्व वाला बुर्जुआ वर्ग ने शासन को स्थिर कर ब्रिटिश औपनिवेशिक राज्य तंत्र पर अपने हाथ आज़माने की कोशिश की।

कॉंग्रेस ने भारत केख़त्म हो रहेउपनिवेशों तथा सांप्रदायिक-जमींदार वर्चस्व वाली मुस्लिम लीग द्वाराआत्मसमर्पण के आगे झुकते हुए 1947केउत्तरार्ध में न केवल देश के विभाजन को स्वीकार किया, बल्कि पंजाब और बंगाल के सांप्रदायिक विभाजन पर ज़ोर देते हुए हिंदू महासभा का समर्थन भी किया।

एक विश्लेषण के अनुसार,बोल्शेविक लेनिनवादी पार्टी ऑफ इंडिया (BLPI) के ट्रॉट्स्कीवादियों नेइन सब घटनाक्रमों के बीच कॉंग्रेस के उस दोहरे झूठ का पर्दाफाश कर दिया जिसमें कॉंग्रेस नेतृत्व विभाजन द्वारा आज़ादी के माध्यम से “सांप्रदायिक समस्या” हल होने की बात कह रहा था।

इस पर BLPIद्वारा"साम्राज्यवादी दासता की जंजीरों को न उखाड़कर एक साधन" न बनकर देशों के बीच मेंसांप्रदायिक दुश्मनीको उकसाएगा और सभी राज्यों में "सांप्रदायिकता" को बढ़ावादिये जाने की चेतावनी जारी की गई। ये बात साफ़ है कि दक्षिण एशिया की विशाल जनसंख्या को एकजुट करने का लक्ष्य बुर्जुआ-सांप्रदायिक तथा बुर्जुआ शासन के विरुद्ध संघर्ष करने से हीहासिल करना होगा। बीएलपीआई के अनुसारजिस प्रतिक्रिया कोबुर्जुआ वर्ग खारिज करताहैउसे इसे केवल श्रमिक वर्ग ही एकजुट कर सकता है।

ये विश्लेषण दोनों देशों के विभाजन से पैदा हुए कश्मीर के इस खुले घाव को प्रतिक्रियात्मक तौर पर दिखाता है।

सात दशकों से भी लंबे समय से भारत और पाकिस्तान दोनों देशों ने उन कश्मीरी लोगों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन किया है जो 1947-48 के पहले युद्ध के बाद सेदुनिया की सबसे बड़ी किलेबंद सीमा में विभाजन का ये दंश झेल रहे हैं।

1989 से भारत जम्मू-कश्मीर में एक ऐसे "गंदे युद्ध" में शामिल है जो राज्य में चुनावों में धांधली के बाद उग्रवाद रूप में भड़काऔर इन्सानों के गायब होने जैसी स्थितियों के लिए कुख्यात तमाम विरोधों के बाद दबा दिया गया। इस बीच, पाकिस्तानजम्मू-कश्मीर मेंभारतीय शासन के प्रति अपना नाराज़गीऔर रोष जाहिर करने के अलावाअपनी रणनीतिक हितों की चाल खेलने के लिए सांप्रदायिक और जातीय हमले कर रहेइस्लामिकअलगाववादियोंकालगातार समर्थन कर रहा है।

आज़ादी के बाद से पाकिस्तान का अमेरिका के साथ गठजोड़ एक अमेरिकी साम्राज्यवादी के तौर पर सोवियत संघ के खिलाफ शीत युद्ध के रूप में जारी है। हालात ये हैं कि आज देश का करीब आधा हिस्सा अमेरिकीसैन्य तानाशाही द्वारा प्रायोजितहै।

विश्वयुद्ध के बाद भारतीय पूंजीपतियों द्वारा इस स्थिति का लाभ उनकीपूंजीवादी परियोजनाओंके विकास को आगे बढ़ाने के लिए सोवियत संघ का समर्थन कर अपने फ़ायदे के लिए उठाया गया तथा इसे "कांग्रेस समाजवाद" का नाम दिया गया। उनके इस कदम ने जनता को गरीबी में धकेले जाने के साथ-साथ पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। इसके साथ ही कॉंग्रेस "साम्राज्यवाद-विरोधी" के तौर पर गुट-निरपेक्ष आंदोलन की अग्रणी पार्टी बनकर विश्व पटल पर आ गई।

बढ़ता सामाजिक विरोध रोकने के लिएभारतीय पूंजीपति वर्ग भीपाकिस्तान की तरहजातीयवसांप्रदायिक मतभेदों को उकसाने के पुराने ब्रिटिश फार्मूले को अपनाता रहा है। भारतीय गणतंत्र के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता के चलते कांग्रेस पार्टी ने हिंदू राष्ट्रवाद को चुपचापबढ़ावा दिया।इनकी यही नीति 1984के सिख-विरोधी और 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसे सांप्रदायिक दंगों का गवाह बनी।

भारतीय पूंजीपतियों द्वारा साम्राज्यवादी प्रतिक्रिया अपनाना

यूएसएसआर में जिस समयवैश्वीकरणऔर स्टालिनवादी शासनके दौरानपूंजीवाद नेपूंजीवादी विकास रणनीति के तहत अपने पैर पसार रहा था, भारतीय पूंजीपति समाजवादी, पूंजीवाद-विरोधी औरधर्मनिरपेक्ष बने रहे। सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने अमेरिकाके साथ गठजोड़ कर भारत को वैश्विक बाज़ार के लिए एक सस्ते-श्रम बाज़ार के रूप में उपलब्ध करवाया।

1991 के बाद भारत में खुशहाली पर एक ऐसे छोटे पूंजीवादी शासनका एकाधिकार रहा है जिसने कारखानों के मुनाफ़े और सार्वजनिक संपत्ति की ताबड़तोड़ बिक्री पर कब्जा कर लिया। यही कारण है कि आज दुनिया में सबसे अधिक सामाजिक असमानता व गरीबी ज्यादा भारत में देखी जाती है।

इसके बावजूद भी पूंजीपति संतुष्ट नहीं हैं। वे डरे हुए व चिंतित हैं।वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और अंदरूनी भू-राजनीतिक संघर्ष भारतीय पूंजीपतियोंको चीन के मुक़ाबले एक बेहतर व काबिलश्रम बाज़ार के रूप में उभरने और महान-शक्ति कहलाने का दावा नहीं करने देता।

कॉरपोरेट इंडिया ने उदारवादी पुनर्गठन व अधिक आक्रामक तरीके से विश्व पटल पर अपने हितों को आगे बढ़ाने के मकसद से मोदी का समर्थन कर दक्षिणपंथी भाजपा को देश की अग्रणी राजनीतिक पार्टीके तौर पर खड़ा कर दिया है।

आज मोदी सरकारविश्व राजनीति में अपनी पैठ बनाने को लालायित है। सरकार भारतीय पूँजीवाद "विकसित" करने हेतूतेल व अन्य आवश्यक संसाधन जुटाने के लिए प्रतिबद्ध है। पाकिस्तान के विरुद्ध“नियमों को बदलने” के लिए मोदी सरकार को दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपना आधिपत्य स्थापित करनापड़ा।पाकिस्तान के साथ संघर्ष जारी रखने के साथ आज ये सरकार श्रमिक वर्ग की बढ़ती संघर्ष परिस्थितियों वसामाजिक तनाव को ख़त्म करना चाहती है।

मोदी सरकार नेअपनी पूर्ववर्ती कांग्रेस द्वारा भारत-अमेरिका "वैश्विक रणनीतिक साझेदारी” को और आगे बढ़ाया है। जहां एक ओर आजअमेरिका चीन को सामाग्री उपलब्ध करा रहा है वहीं दूसरी ओर आज मोदी सरकारने “अमेरिकी सैन्य-रणनीतिक” के द्वारा चीन के खिलाफ भारत को एक महत्वपूर्ण व अग्रणी देश बना दिया है।

आज अमेरिका नाटकीय रूप से पाकिस्तान के साथ अपने सम्बन्धों को कम कर रहा है वहीं भारत सरकार ने भी पाकिस्तान के साथ अपने सम्बन्धों को ख़त्म कर पाकिस्तान के खिलाफ अपने अभियान को तेज़ कर दिया है।

इस भारत-अमेरिकी गठबंधन के खतरे ने चीन और पाकिस्तान को अपने सैन्य-रणनीतिसंबंधों कोलंबे समय तक जारी रखने के लिए मजबूर किया है।

युद्ध औरसांप्रदायिकता के विरुद्ध श्रमिक वर्ग की एकजुटता

अमेरिका और चीन के बीच ये बढ़ती हुई प्रतिद्वंदिता भारत-पाकिस्तान तथा भारत-चीन के सम्बन्धों के साथ-साथ दक्षिण एशिया और दुनिया भर के लिएएक ख़तरा है।कश्मीर के विवादित क्षेत्र का मसला इन तीन संघर्षों को और अधिक हवा देता है।

कश्मीर चीन के स्वायत्त तिब्बत और झिंजियांग क्षेत्र के अलावा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की सीमापर स्थितक्षेत्र है। ये क्षेत्र चीन के लिए एक तोहफ़े की तरह है, चूंकि ये अमेरिका को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में युद्ध अथवा युद्ध की स्थितियों में चीन के बन्दरगाहों पर नज़र रखने से बाधित करता है।

भारतीय पूँजीपति वर्ग पिछले तीन दशकों से तेज़ी से दक्षिणपंथ की ओर बढ़ा है। भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के श्रमिक वर्ग की संख्या और अधिकारों में व्यापक सुधार हुआ है। इसके बावजूद भीश्रमिक वर्गको आज सामाजिक असमानता,सैन्यवादतथा पूंजीवाद के खिलाफ पूरी दुनिया में अहम रूप से एकजुट होकर काम करने की ज़रूरत है।

केवल इसी तरीके से सांप्रदायिकप्रतिवाद और युद्द की किसी स्थिति को ख़त्मकिया जा सकता है। भारत व पाकिस्तान दोनों देशों के श्रमिकों को प्रतिक्रियावादी पूंजीवादके विरोध मेंअपना संघर्ष तेज़ करना होगा। लियोन ट्रॉट्स्की द्वाराबताई गई स्थायी क्रांति की रणनीति के आधार परउन्हें संयुक्त राज्य दक्षिण एशिया की लड़ाई में शामिल होकर दुनिया भर के श्रमिकों को अपने इस संघर्ष में शामिल करना चाहिए।

श्रमिकों के गठजोड़ की शक्ति ही साम्राज्यवादको उखाड़ फेंक सक्ने में सक्षम है। दक्षिण एशिया की बड़ी जनसंख्या का एकजुट होना सांप्रदायिकता और जातिवादसे मुक्ति दिलाएगा ताकि सरकार पर बेहतर नौकरियों, आय और बुनियादी सेवाओं के लिए दबाव बनाया जा सके।

दशकों से राष्ट्रवाद और पूंजीपति वर्ग के एक या किसी अन्यप्रगतिशील गुट से बंधे हुए मज़दूर वर्ग कोस्टालिनवादके माओवादी संस्करणपर आधारित एक राजनीतिक युद्धही बाहर निकाल सकता है। ये सभी पार्टियां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की उस राजनीतिक विरासत का हिस्सा हैं जिसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को मज़दूर वर्ग के अधीन किया था।

दशकों से सीपीआई और इस से पैदा हुआ दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बुर्जुआ मंडलीकी अभिन्न सहयोगी के रूप में कार्यरत है। इनमें से अधिकतर1991और 2008के बीच कांग्रेस की अगुआई मेंनव-उदारवादी सुधारों और अमेरिकाकेसाथ गठजोड़ का नेतृत्व कर दक्षिणपंथी सरकार का समर्थन करते रहे हैं तथा साथ ही ये भारत के उस सैन्य बजट कासमर्थन भी करते हैं जिसका बजट आज दुनिया में चौथे स्थान पर है और जो सितंबर 2016 और इस वर्ष फरवरी में मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तान पर हमले की समर्थक है।

सीपीआई व सीपीएम कांग्रेस तथा अन्य बुर्जुआ पार्टियों द्वारा मज़दूर वर्ग और भारतीय बुर्जुआ राज्य के “लोकतांत्रिक” संस्थानोंको बर्बादी की हद तक नुकसान पहुँचाये जाने पर तथा मई महीने में मोदी सरकार के दुबारा चुने जाने पर उत्साहित हैं।

20वीं सदी की शुरुआत के सभी बड़े सामाजिक संघर्ष हमें बताते हैं कि समाजवादी क्रान्ति की इस लड़ाई के अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए दुनिया भर के श्रमिकों को एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में एकजुट होना होगा।

हम भारत तथा पाकिस्तान के अपने सभी WSWS पाठकों से अपने देश में समाजवाद की लड़ाई लड़ने के लिए फ़ोर्थ इंटरनेशनल की अंतर्राष्ट्रीय कमेटी के खण्डों का निर्माण करने का आग्रह करते हैं।

कीथ जोन्स